Wednesday, April 11, 2012

Surk Chenaab


एक मुद्दत से वो वादी मुझको बुला रही है,
लेकिन में बुजदिल जाने से डरता हु,
डर लगता है के शायद बर्दाश्त ना कर पाऊ,
उस वीराने को, उस बिखरे अफसाने को,

जहाँ शिकारे लुका छिपी खेलते थे चिनार के पत्तों के साथ,
आज  वहा गुमनामी है,
सेब के बगीचों में बच्चो की हंसी, 
ना जाने कहाँ खो सी गयी है,

जलती थी दुनिया जिससे,
आज वो जन्नत ही जल रही है,
गम है तो बस इस बात का है,
के ये आग भी अपनों से लगी है,

लोग बदल रहे हैं, ज़माना बदल रहा है,
मेरा कश्मीर, तेरा कश्मीर, किसका कश्मीर,
अरे कश्मीर ही तो हातों से फिसल रहा है,
लेकिन मानने को तयार कौन है, 

अरे क़्त की पथराई आँखों में झाँक  करदेखो मियाँ,
आज तो कुदरत  ने भी बदलना सीख  लिया है,
 जन्नत था मेरा घर एक ज़माने में,
आज  व हा सुर्ख चेनाब दस्तक देती है!

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